+ क्या स्वयं में दु:ख-सुख से पुण्य-पाप होता है ? -
पुण्यं ध्रुवं स्वतो दु:खात् पापं च सुखतो यदि
वीतरागो मुनिर्विद्वांस्ताभ्यां युञ्ज्यान्निमित्तत: ॥93॥
अन्वयार्थ : [यदि स्वत: दु:खात् ध्रुवं पुण्यं सुखत: च पापं] यदि स्वयं में दु:ख उत्पन्न करने से निश्चित ही पुण्य का बंध एवं स्वयं को सुख देने से पाप का बंध होता है तब तो [वीतरागो विद्वान् मुनि: निमित्तत: ताभ्यां युंज्यात्] कषाय रहित वीतराग मुनि और विद्वान् मुनिजन भी पुण्य-पाप का बंध करने लगेंगे क्योंकि ये भी अपने सुख-दु:ख की उत्पत्ति में निमित्त कारण होते हैं।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


यदि अपने को दु:ख देने से, पुण्य बंध सुख से हो पाप;;तब तो वीतराग मुनि निज में, कायक्लेश से सहते ताप;;मुनि विद्वान् तत्त्व को समझें, संतोषामृत सुख भोगी;;ये दोनों फिर पुण्य-पाप से, बंधे मुक्ति किसको होगी
यदि अपने आप में दु:ख को उत्पन्न करने से एकांत से पुण्य बंध एवं सुख उत्पादन करने से पाप बंध माना जावे, तो वीतराग एवं विद्वान् मुनि भी निमित्त से पुण्य, पाप से बंध जाने चाहिए।