
ज्ञानमती :
यदि अपने को दु:ख देने से, पुण्य बंध सुख से हो पाप;;तब तो वीतराग मुनि निज में, कायक्लेश से सहते ताप;;मुनि विद्वान् तत्त्व को समझें, संतोषामृत सुख भोगी;;ये दोनों फिर पुण्य-पाप से, बंधे मुक्ति किसको होगी
यदि अपने आप में दु:ख को उत्पन्न करने से एकांत से पुण्य बंध एवं सुख उत्पादन करने से पाप बंध माना जावे, तो वीतराग एवं विद्वान् मुनि भी निमित्त से पुण्य, पाप से बंध जाने चाहिए।
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