+ पुण्य-पाप का उभय एवं अवक्तव्य भी एकांत से सदोष है -
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥94॥
अन्वयार्थ : [स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्] स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियों के यहाँ इन पुण्य-पापरूप दोनों सिद्धांतों का एकात्म्य भी नहीं है क्योंकि परस्पर में विरोध आता है [अवाच्यतैकांते अपि अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते] यदि दोनों को अवाच्य ही एकांत से कहा जाये, तो यह पुण्य-पाप बंध अवाच्य है यह कथन भी अशक्य हो जावेगा।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


पुण्य-पाप के बंध, उभय का, यदि एकात्म्य लिया जावे;;स्याद्वाद विद्वेषी जन में, सदा विरोधि रहा आवे;;यदि दोनों की ‘अवक्तव्यता’, कहो सदा एकांत सही;;तब तो ‘अवक्तव्य’ इस वच से, स्वमत कथन यह शक्य नहीं
स्याद्वादविद्वेषी के यहाँ उभयैकात्म्य भी ठीक नहीं हैं, क्योंकि परस्पर में विरोध आता है। सर्वथा ‘अवाच्य’ तत्त्व को स्वीकार करने पर तो ‘अवाच्य’ यह कथन भी नहीं बन सकेगा।