
ज्ञानमती :
पुण्य-पाप के बंध, उभय का, यदि एकात्म्य लिया जावे;;स्याद्वाद विद्वेषी जन में, सदा विरोधि रहा आवे;;यदि दोनों की ‘अवक्तव्यता’, कहो सदा एकांत सही;;तब तो ‘अवक्तव्य’ इस वच से, स्वमत कथन यह शक्य नहीं
स्याद्वादविद्वेषी के यहाँ उभयैकात्म्य भी ठीक नहीं हैं, क्योंकि परस्पर में विरोध आता है। सर्वथा ‘अवाच्य’ तत्त्व को स्वीकार करने पर तो ‘अवाच्य’ यह कथन भी नहीं बन सकेगा।
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