
ज्ञानमती :
यदी स्व-पर का सुख उनके, परिणाम विशुद्धी में हेतू;;तथा स्व-पर का दु:ख उनके, संक्लेश भाव में यदि हेतू;;तब ये सुख-दु:ख पुण्य-पाप के, आस्रव में हेतू बनते;;यदि ऐसा नहिं तब तो अर्हन्! तव मत में यह व्यर्थ कहे
यदि अपने सुख-दु:ख एवं परसंबंधी सुख, दु:ख विशुद्धि एवं संक्लेश के निमित्त से होते हैं तब तो उनसे ही पुण्य और पाप का आस्रव होना युक्त ही है। यदि विशुद्धि और संक्लेश रूप परिणाम नहीं है, तब तो वे व्यर्थ ही हैं अर्थात् पुण्य, पाप का आस्रव हो ही नहीं सकता है, ऐसा आप अर्हत्प्रभु का सिद्धान्त है।
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