+ अज्ञान, अल्पज्ञान से बंध-मोक्ष का उभय और अवक्तव्य नहीं बनता है -
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥97॥
अन्वयार्थ : [स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्] स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियों के यहाँ अज्ञान से बंध और अल्पज्ञान से मोक्ष इनका उभय एकात्म्य भी ठीक नहीं है। क्योंकि परस्पर में विरोध है [अवाच्यतैकांते अपि अवाच्यं इतिउक्ति: न युज्यते] यदि सर्वथा इन दोनों का अवाच्य ही कहा जाये, तो अज्ञान- ज्ञान से बंध-मोक्ष की व्यवस्था कह नहीं सकते अत: ‘अवाच्य है’ यह कथन भी वाच्य ही होने से आपका एकांत नहीं रहता है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


यदि अज्ञान-ज्ञान से बंध-मोक्ष उभय का ऐक्य कहो;;स्याद्वाद विद्वेषी मत में, उभय विरोधी हैं तब तो;;यदि दोनों का ‘अवक्तव्य’ ही, अनपेक्षित हो मान लिया;;तब तो अवक्तव्य इसको भी, कैसे वच से प्रकट किया
स्याद्वादन्याय के द्वेषियों के यहाँ इन दोनों का परस्पर निरपेक्ष एकांत भी श्रेयस्कर नहीं है, क्योंकि विरोध आता है। एकांत में अवाच्यता को स्वीकार करने पर ‘अवाच्य’ यह वचन ही कथमपि शक्य नहीं है।