+ कर्मबंध के अनुसार संसार विचित्र है -
कामादिप्रभवश्चित्र: कर्मबन्धाऽनुरूपत:
तच्च कर्म स्वहेतुभ्यो जीवास्ते शुद्ध्यशुद्धित: ॥99॥
अन्वयार्थ : [कामादिप्रभव: चित्र: कर्मबंधानुरूपत:] यह काम, क्रोध आदि से होने वाला संसार विचित्ररूप है वह संसार अपने-अपने कर्म के अनुकूल ही होता है [तत् च कर्मस्वहेतुभ्य:] और वह कर्म भी अपने-अपने रागादि परिणाम के निमित्त से होता है (ते जीवा: शुद्ध्यशुद्धित:) जिनको कर्मबंध होता है, वे जीव भी शुद्धि और अशुद्धि के भेद से दो प्रकार के होते हैं।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


काम कृधादिक भावों से है, यह उत्पन्न भाव संसार;;स्वयं उपार्जित कर्मों के, अनुरूप दिखे हैं विविध प्रकार;;वह ही कर्म हुआ है अपने, रागादिक परिणामों से;;कर्म सहित प्राणी दो विध हैं, भव्य-अभव्य प्रकारों से
जो काम-रागादिकों का उत्पाद होता है वह कार्यरूप-भाव संसार नाना प्रकार का है वह ज्ञानावरणादि कर्मबंध के अनुसार ही होता है औरवह कर्म अपने हेतुभूत रागादि परिणामों से ही होता है तथा वे जीव शुद्धि- भव्यत्व और अशुद्धि-अभव्यत्व के भेद से दो प्रकार के हैं।

भावार्थ-कोई इस संसार को ईश्वर कृत मानते हैं, किन्तु जैनाचार्यों ने इस संसार को कर्मबंध के निमित्त से होता है, ऐसा माना है। कर्मसहित संसारी जीव के भी दो भेद माने हैं भव्य और अभव्य। आगे कारिका में इसी का स्पष्टीकरण करते हैं।