+ शुद्धि-अशुद्धि शक्तियाँ कैसी हैं -
शुद्ध्यशुद्धी पुन: शक्ती ते पाक्या ऽपाक्यशक्तिवत्
साद्यनादी तयोव्र्यक्ती स्वभावोऽतर्कगोचर:॥100॥
अन्वयार्थ : [पुन: ते शुद्ध्यशुद्धी शक्ती पाक्याऽपाक्यशक्तिवत्] पुन: जीव की वे शुद्धि-अशुद्धि शक्तियाँ पकने योग्य न पकने योग्य की शक्ति के समान हैं [तयो: व्यक्ती साद्यनादी] उन दोनों शक्तियों की व्यक्ति-प्रकटता सादि और अनादि है [स्वभाव: अतर्कगोचर:] क्योंकि स्वभाव तर्क के गोचर नहीं होता है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


भव्य अभव्य कही दो शक्ती, पकने योग्य न पकने योग्य;;उड़द शक्तिवत् इन दोनों की, अभिव्यक्ती है सादि-अनादि;;सम्यक्त्वादि प्रकट भव्यों के, अभव्य कोरडू मूंग समान;;वस्तु स्वभाव तर्क करने का, विषय नहीं हो सके प्रधान
जीवों की ये शुद्धि और अशुद्धि रूप दो शक्तियाँ मूंग आदि के पकने योग्य एवं न पकने योग्य शक्ति के समान हैं पुन: इन दोनों की शक्ति भव्य एवं अभव्य जीवों की अपेक्षा से सादि एवं अनादि है वस्तु का यह स्वभाव तर्क के अगोचर है।

भावार्थ-संसारी जीव के भव्य-अभव्य के भेद से दो भेद हैं उनमें जो शक्तियाँ हैं, वे पकने योग्य उड़द या नहीं पकने योग्य उड़द के समान है। जैसेकोरडू मूंग या उड़द चाहे जितना पकाओ नहीं पकता है वैसे ही अभव्य जीव कभी भी मोक्ष नहीं जा सकते हैं उनकी शुद्धता प्रकट नहीं हो सकती है, इसीलिए य अशुद्ध ही हैं इनकी अशुद्धि अनादि है, अनंत हैं किन्तु भव्य जीव कर्मों का नाश करके शुद्ध हो जाते हैं इसलिए इनकी शुद्धता की प्रकटता सादि है। कोई कहे ऐसा क्यों ? तो इसका कोई उत्तर नहीं है, क्योंकि वस्तु का स्वभाव प्रश्न का विषय नहीं होता है।