+ ब्रह्मवाद और भेदवाद में भी प्रमाण आदि व्यवहार संभव हैं अत: वे संग्रहावास और नैगमाभास कैसे हैं ? इस प्रकार के आक्षेप को समाप्त करते हुए कहते हैं -
प्रामाण्यं व्यवहाराद्धि स न स्यात्तत्त्वतस्तयो:।
मिथ्यैकांते विशेषो वा क: स्वपक्षविपक्षयो:॥11॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[व्यवहारात् हि प्रामाण्यं] निश्चित रूप से व्यवहार से प्रमाणता होती है। [तयो:] इन ब्रह्मवाद और भेद में [स: तत्त्वत: न स्यात्] वह व्यवहार वास्तविक नहीं है। [वा] अथवा [मिथ्यैकांते] इस व्यवहार को एकांत से मिथ्या मानने पर [स्वपक्ष विपक्षयो:] स्वपक्ष और विपक्ष में [का विशेष:] क्या अंतर रहेगा ?॥११॥

  अभयचन्द्रसूरि 

अभयचन्द्रसूरि :

तात्पर्यवृत्ति-अपने इष्ट के साधन और अनिष्ट के दूषण में निमित्तक प्रत्यक्ष अथवा अन्य- अनुमान आदि प्रमाण हैं, इस बात को सभी को स्वीकार करना चाहिए, अन्यथा अतिप्रसंग आ जावेगा और वह प्रमाण व्यवहार से उन दोनों में वास्तविक नहीं है अर्थात् विधिपूर्वक अवहरण-विभाग करना-भेद कल्पना करना व्यवहार कहलाता है। इस व्यवहार का आश्रय लेकर संग्रहाभास और नैगमाभास में प्रमाणता परमार्थ से नहीं है।

निश्चित ही निरपेक्ष भावैकांत में प्रमाण आदि भेद व्यवहार नहीं है, इसका पहले निराकरण कर दिया है। भेदैकांत में भी प्रमाण और प्रमाण के फल का व्यवहार नहीं है क्योंकि उसमें संबंध का अभाव है।

प्रश्न-उनमें औपचारिक प्रमाण और फल का व्यवहार है ?

उत्तर-भेद एकांत के पक्ष में यदि आप प्रमाण और फल के व्यवहार को एकांत से अवास्तविक स्वीकार करते हैं तब तो स्वपक्ष और परपक्ष में क्या अंतर होगा ? अर्थात् कुछ भी अंतर नहीं होगा।

ब्रह्मवादी के पक्ष में ब्रह्मवाद स्वपक्ष है और क्षणिकवाद विपक्ष है। यौग के पक्ष में भेदवाद स्वपक्ष है और अद्वैतवाद विपक्ष है।

भेदैकांत में प्रमाण, फल आदि व्यवहार को मिथ्या मानने पर तो स्वपक्ष और परपक्ष में संकर का प्रसंग आ जावेगा इसलिए कथंचित् प्रमाणादि व्यवहार भी वास्तविक स्वीकार करना चाहिए।

विशेषार्थ-ब्रह्मवादी का कहना था कि हमारे यहाँ प्रमाणादि व्यवहार संभव हैं पुन: हमारे ब्रह्मवाद को विषय करने वाला नय संग्रहाभास कैसे होगा ? ऐसे ही यौग ने कहा कि हमारे भेद पक्ष में भी प्रमाणादि व्यवहार होते हैं पुन: हमारे मत के पदार्थों को जानने वाला नय नैगमाभास कैसे कहलाएगा ? आचार्यों ने कहा कि यह प्रमाण आदि का कथन व्यवहार मात्र से ही है अर्थात् कल्पित ही है किन्तु वास्तविक नहीं है, पुन: उस कल्पित मात्र प्रमाण आदि की व्यवस्था से स्वपक्ष और परपक्ष में अंतर सिद्ध करना असंभव हो जावेगा इसलिए प्रमाण आदि व्यवहार को आप कल्पित मत कहिए और वास्तविक प्रमाण आदि व्यवस्थाएँ जहाँ हैं वहाँ एकांत मान्यता को गुंजाइश नहीं है।