अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-यदि अन्वय और व्यतिरेक से अर्थ-विषयभूत पदार्थ ज्ञान के कारण हैं। कारण के होने पर कार्य का होना अन्वय है और नहीं होने पर नहीं होना व्यतिरेक है। उसी को स्पष्ट करते हैं-ज्ञान अर्थनिमित्तक है क्योंकि अर्थ का ज्ञान के साथ अन्वय व्यतिरेक पाया जाता है। यदि ऐसी बात है तो संशय और विपर्यय ज्ञानों की उत्पत्ति कहाँ से हो गई है। इस पर आपको अपने मन में विचार करना चाहिए क्योंकि अर्थ के अभाव में भी संशय आदि ज्ञान उत्पन्न होते हैं। स्थाणु पुरुष रूप अथवा केश मच्छर स्वभाव वाले कोई भी पदार्थ नहीं हैं, जो कि उस संशय आदि के ज्ञान में व्यापार करते हों इसलिए यह ज्ञान का अन्वय व्यतिरेक के अनुसरण रूप हेतु भागासिद्ध है, ऐसा समझना। विशेषार्थ-जहाँ-जहाँ पदार्थ हों, वहीं-वहीं ज्ञान उत्पन्न होवे और जहाँ-जहाँ पदार्थ न हों वहाँ-वहाँ ज्ञान उत्पन्न न होवे। यह हुआ अर्थ के साथ ज्ञान का अन्वय-व्यतिरेक और यदि ऐसा अन्वय व्यतिरेक है तब स्थाणु में दूर से देखने पर यह पुरुष है या स्थाणु ? ऐसा संशय ज्ञान कैसे होगा ? क्योंकि वहाँ स्थाणु में स्थाणु और पुरुषरूप उभयात्मक वस्तु तो हैं नहीं। ऐसे ही केशों में अकस्मात् दूर से मच्छर का ज्ञान हो गया, यह विपरीत ज्ञान भी यदि केश मच्छर रूप नहीं है तो कैसे हुआ ? जो आप बौद्धों ने कहा था कि ज्ञान पदार्थ से उत्पन्न होता है इस बात को अनुमान प्रमाण बताता है। उस अनुमान में आपका हेतु एकदेश असिद्ध होने से असिद्ध हेत्वाभास हो गया है इसलिए ज्ञान को पदार्थ से उत्पन्न होना मानना नितांत गलत है, बिना पदार्थ के भी ज्ञान स्वयं उत्पन्न होता रहता है चूँकि वह आत्मा का स्वभाव है। |