अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-ईक्षक-चक्षुष्मानजन, निरोधि-प्रमेयांतर को ढकने वाले तम-अंधकाररूप पुद्गलपर्याय को विशेष-नीलादिरूप से देखते हैं किन्तु वृत्त-आच्छादित हुए पर घटादिक तमसा- अंधकार से नहीं देखते हैं। तब आलोक ज्ञान का कारण कैसे हो सकता है क्योंकि प्रकाश के अभाव में भी ज्ञान की उत्पत्ति हो रही है। इसी अर्थ को सिद्ध करने के लिए दृष्टांत देते हैं-जैसे दर्शक लोग दीवाल आदि को देखते हैं किन्तु दीवाल आदि से तिरोहित घटादिकों को नहीं देख सकते हैं, उसी प्रकार से अंधकार को तो देख लेते हैं किन्तु उनसे ढके हुए घटादि वस्तुओं को नहीं देख पाते हैं। शंका-अंधकार के समान प्रकाश से ढके हुए भी घटादि को नहीं देख सकते हैं ? समाधान-यदि ऐसी बात है तो होवे, यदि प्रकाश को अविशदपना है। जिस द्रव्य में विशदता है अर्थात् जो द्रव्य स्पष्ट है वह ढका हुआ भी नहीं ढके हुए के समान ही है, स्फटिक और अभ्रक आदि से ढके हुए के समान इसलिए आलोक के समान उससे ढके हुए को भी देख लेते हैं क्योंकि वह वैशद्य है-स्पष्ट है। पुन: अंधकार को तो देख लेते हैं किन्तु उससे ढके हुए को नहीं देख पाते हैं क्योंकि वह अस्पष्ट रूप है। इसलिए आलोक ज्ञान का कारण नहीं है क्योंकि वह प्रमेयरूप है, पदार्थों के समान। इस प्रकार से ज्ञान का अंतरंग कारण ज्ञानावरण और वीर्यांतराय कर्मों का क्षयोपशम है पुन: बहिरंग कारण इंद्रियां और मनरूप हैं यह बात सिद्ध हो गई है। विशेषार्थ-बौद्ध अर्थ के समान प्रकाश को भी ज्ञान का कारण मानते हैं किन्तु जैनाचार्य कहते हैं कि प्रकाश भी ज्ञान का कारण नहीं है वह भी ज्ञान का विषय है। जैसे कि अंधकार ज्ञान का कारण नहीं है बल्कि ज्ञान का विषय अवश्य है, प्रत्येक प्राणी अंधकार को काले-काले रूप में देख रहा है किन्तु उससे ढके हुए पदार्थों को तो नहीं देख पाता है उसी प्रकार प्रकाश भी ज्ञान का विषय ही है। ज्ञान का कारण नहीं हो सकता है। ज्ञान तो आत्मा का गुण है जो कि संसार अवस्था में कर्मों से ढका हुआ है इसलिए ज्ञानावरण और वीर्यांतराय के क्षयोपशमरूप अंतरंग कारण से तथा इंद्रिय और मन के निमित्तरूप बहिरंग कारण से उत्पन्न होता है। |