+ उदाहरण, उपनय और निगमन की आवश्यकता -
बालव्युत्पत्त्यर्थं तत्त्रायोपगमे शास्त्रा एवासौ न वादेऽनुपयोगात् ॥42॥
अन्वयार्थ : [बालव्युत्पत्त्यर्थं] मंदबुद्धि वाले बालकों (अल्पज्ञानियों) की व्यत्पुत्ति के लिए (ज्ञान कराने के लिए) [तत्त्रायोपगमे] उन तीन - उदाहरण, उपनय, निगमन - अवयवों को मान लेने पर भी [शास्त्रा] शास्त्रा में [एव] ही [असौ] उनकी स्वीकारता है, [वादे] वाद में [न] नहीं, क्योंकि वाद में [अनुपयोगात्] उनका उपयोग नहीं है। (वाद करने का अधकिार विद्वानों को ही होता है और वे पहले से ही व्युत्पन्न रहते हैं, इसलिए उनको उदाहरणादि का प्रयोग उपयोगी नहीं होता।)
Meaning : These three, the example (udāharana, drushtānta), etc., have acceptability only in imparting learning to the dim-witted, not in scholarly-discussion; these are of no use in scholarly-discussion.

  टीका