+ प्रमाण का फल -
अज्ञाननिवृत्तिर्हानोपादानोपेक्षाश्च फलम् ॥1॥
अन्वयार्थ : अज्ञान की निवृत्ति, त्याग, ग्रहण के प्रति उदासीनता ये प्रमाण के फल हैं।

  टीका 

टीका :

अज्ञान की निवृत्ति अज्ञाननिवृत्ति (षष्ठी तत्पुरुष) प्रमेय सम्बन्धी अज्ञान का निराकरण हेतु यह अर्थ लेना है। हानं च उपादानं च उपेक्षा चेति हानोपादापेक्षाः यहाँ द्वन्द्व समास है। हान का अर्थ त्याग, उपादान का अर्थ ग्रहण, उपेक्षा का अर्थ अनादर है, अतः प्रमाण का फल दो प्रकार है - साक्षात् फल और परम्परा फल, किसी वस्तु का त्याग, किसी वस्तु का ग्रहण और किसी वस्तु का अनादर त्यागादि का प्रमेय के निश्चय करने के उत्तरकाल में होता है। 269. फल कितने प्रकार का होता है ? दो प्रकार का - साक्षात् फल और परम्पराफल।

प्रश्न – साक्षात् फल किसे कहते हैं ?

उत्तर –
वस्तु के जानने के साथ ही तत्काल होने वाले फल को साक्षात् फल कहते हैं।

प्रश्न – परम्पराफल किसे कहते हैं ?

उत्तर –
वस्तु के जानने के पश्चात् परम्परा से प्राप्त होने वाले फल को परम्पराफल कहते हैं।

प्रश्न – हान किसे कहते हैं ?

उत्तर –
जानने के पश्चात् अनिष्ट या अहितकर वस्तु के परित्याग करने को हान कहते हैं।

प्रश्न – उपादान किसे कहते हैं ?

उत्तर –
इष्ट या हितकर वस्तु के ग्रहण को उपादान कहते हैं।

प्रश्न – उपेक्षा किसे कहते हैं ?

उत्तर –
राग-द्वेष दूर होने के बाद जो उदासीनता रूप भाव है, उसे उपेक्षा कहते हैं । यह दोनों ही प्रकार का फल प्रमाण से भिन्न ही है, ऐसा यौग मानते हैं। प्रमाण से फल अभिन्न नहीं है, ऐसा बौद्ध मानते हैं।