
टीका :
प्रमाण का फल प्रमाता (ज्ञाता) की अपेक्षा से कथञ्चित् प्रमाण से अभिन्न है, जो आत्मा पदार्थ को जानती है, वही पदार्थ विषयक अज्ञान से रहित होती हुई पदार्थ को त्यागती है, ग्रहण करती है और उपेक्षा करती है इस प्रकार प्रतीति होती है। विशेष : इस सूत्र का भाव यह है कि जिस ही आत्मा की प्रमाण के आकार से परिणति होती है, उसके ही फल रूप से परिणाम होता है। इस प्रकार एक प्रमाता की अपेक्षा प्रमाण और फल में अभेद है। कारण और क्रिया रूप परिणाम के भेद से प्रमाण और फल में भेद है। इति पञ्चमः परिच्छेदः समाप्तः
(इस प्रकार पाँचवां परिच्छेद पूर्ण हुआ)
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