+ इस हेतु के असिद्धपना कैसा? -
स्वरूपेणासत्वात् ॥24॥
अन्वयार्थ : शब्द का चाक्षुष होना स्वरूप से ही असिद्ध है।

  टीका 

टीका :

शब्द कर्ण इन्द्रिय से जाना जाता है, चक्षु इन्द्रिय से नहीं। इसलिए शब्द के चाक्षुषपने का कथन स्वरूप से ही ठीक नहीं है।