+ अनैकान्तिक हेत्वाभास -
विपक्षेऽप्यविरुद्धवृत्तिरनैकान्तिकः ॥30॥
अन्वयार्थ : जिसका विपक्ष में भी रहना अविरुद्ध है, अर्थात् जो हेतु पक्ष सम्पदा के समान विपक्ष में भी बिना किसी विरोध के रहता है, उसे अनैकान्तिक हेत्वाभास कहते हैं।सूत्र पठित अपि शब्द से न केवल पक्ष-सपक्ष में रहने वाला हेतु लेना किन्तु विपक्ष में भी रहने वाले हेतु का ग्रहण करना चाहिए।

  टीका 

टीका :

पक्ष में अथवा सपक्ष में विद्यमान होकर भी विपक्षवृत्ति वाला हेतु अनैकान्तिक हेत्वाभास है।

इस हेतु के दो भेद हैं -1 निश्चितविपक्षवृत्ति, 2 शंकितविपक्ष वृत्ति।

पक्ष - संदिग्ध साध्य वाले धर्मी को पक्ष कहते हैं।

सपक्ष - साध्य के समान धर्मी को सपक्ष कहते हैं।

विपक्ष - साध्य के विरोधी धर्मी को विपक्ष कहते हैं।

हेतु का पक्ष और सपक्ष में रहना तो गुण है, परन्तु विपक्ष में रहना दोष है।