
कालांतरस्थे क्षणिके ध्रुवे वा-
ऽपृथक्पृथक᳭त्वाऽवचनीयतायाम् ।
विकारहानेर्न च कर्तृ कार्ये
वृथा श्रमोऽयं जिन ! विद्विषां ते ॥34॥
अन्वयार्थ : [कालान्तरस्थे] पदार्थ के कालान्तर स्थायी होने पर [अपृथक् पृथक्त्वाऽवचनीय-तायाम्] चाहे वह अभिन्न हो, भिन्न हो या अनिवर्चनीय हो, [कर्तृकार्ये च न] कर्ता और कार्य दोनों भी उसी प्रकार नहीं बन सकते जिस प्रकार कि [क्षणिके ध्रुवे वा] पदार्थ के सर्वथा क्षणिक अथवा ध्रुव होने पर नहीं बनते, क्योंकि तब [विकारहानेः] विकार की हानि होती है। अतः [जिन] हे वीर जिन! [ते] आपके [विद्विषां] द्वेषियों का [अयम्] यह [श्रमः] श्रम [वृथा] व्यर्थ है।
वर्णी
वर्णी :
कालांतरस्थे क्षणिके ध्रुवे वा-
ऽपृथक्पृथक᳭त्वाऽवचनीयतायाम् ।
विकारहानेर्न च कर्तृ कार्ये
वृथा श्रमोऽयं जिन ! विद्विषां ते ॥34॥
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