
मद्याङ्गवद्भूत-समागमे ज्ञः
शक्त्यंतर-व्यक्तिरदैव-सृष्टि: ।
इत्यात्म-शिश्नोदर-पुष्टि-तुष्टै-
र्निर्ह्रीभयैर्हा ! मृदव: प्रलब्धा: ॥35॥
अन्वयार्थ : [मद्याङ्गवद् भूतसमागमे ज्ञः शक्त्यन्तरव्यक्तिः] जिस प्रकार मद्य के अंगभूत - पिष्ठोदक, गुड़, धतकी आदि - के समागम होने पर मदशक्ति की उत्पत्ति अथवा आविर्भूती होती है, उसी तरह भूतों के समागम पर चैतन्य उत्पन्न अथवा अभिव्यक्त होता है और यह सब शक्तिविशेष की अभिव्यक्ति है, कोई [अदैवसृष्टिः] दैव सृष्टि नहीं है। [इति] इस प्रकार उन [आत्मशिश्नोदरपुष्टितुष्टैः] अपने शिश्न तथा उदर की पुष्टि में ही संतुष्ट रहने वाले [निर्ह्रीभयैः] निर्लज्जों और निर्भयों के द्वारा [हा] हा! खेद है कि [मृदवः] कोमल-बुद्धि [प्रलब्धः] ठगे गये हैं।
वर्णी
वर्णी :
मद्याङ्गवद्भूत-समागमे ज्ञः
शक्त्यंतर-व्यक्तिरदैव-सृष्टि: ।
इत्यात्म-शिश्नोदर-पुष्टि-तुष्टै-
र्निर्ह्रीभयैर्हा ! मृदव: प्रलब्धा: ॥35॥
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