
दृष्टेऽविशिष्टे जननादि हेतौ
विशिष्टता का प्रतिसत्त्वमेषाम् ।
स्वभावत: किं न परस्य सिद्धि
रतावकानामपि हा ! प्रपात: ॥36॥
अन्वयार्थ : [जननादिहेतौ] जब चैतन्य की उत्पत्ति तथा अभिव्यक्ति का कारण पृथिवी आदि भूतों का समुदाय - [अविशिष्टे] सामान्य [दृष्टे] देखा जाता है [प्रतिसत्त्वमेषाम्] तब इनके मत में प्राणी-प्राणी के प्रति [का विशिष्टता] क्या विशेषता बन सकती है? [स्वभावतः] यदि उस विशिष्टता की सिद्धि स्वभाव से ही मानी जाये तो फिर [परस्य सिद्धिः] चारों भूतों से भिन्न पाँचवें आत्मतत्त्व की सिद्धि [किं न] स्वभाव से क्यों नहीं मानी जाये? [अतावकानाम्] इस तत्त्वान्तर-सिद्धि को न मानने वाले जो अतावक हैं उनका [अपि] भी [हा!] हाय! यह कैसा [प्रपातः] प्रपतन हुआ है !!
वर्णी
वर्णी :
दृष्टेऽविशिष्टे जननादि हेतौ
विशिष्टता का प्रतिसत्त्वमेषाम् ।
स्वभावत: किं न परस्य सिद्धि
रतावकानामपि हा ! प्रपात: ॥36॥
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