+ भूतचतुष्टय से चैतन्य की उत्पत्ति की मान्यता का निरसन- -
दृष्टेऽविशिष्टे जननादि हेतौ
विशिष्टता का प्रतिसत्त्वमेषाम् ।
स्वभावत: किं न परस्य सिद्धि
रतावकानामपि हा ! प्रपात: ॥36॥
अन्वयार्थ : [जननादिहेतौ] जब चैतन्य की उत्पत्ति तथा अभिव्यक्ति का कारण पृथिवी आदि भूतों का समुदाय - [अविशिष्टे] सामान्य (बिना किसी विशेषता के) [दृष्टे] देखा जाता है [प्रतिसत्त्वमेषाम्] तब इनके (चार्वाकों के) मत में प्राणी-प्राणी के प्रति [का विशिष्टता] क्या विशेषता बन सकती है? (इस पर) [स्वभावतः] यदि उस विशिष्टता की सिद्धि स्वभाव से ही मानी जाये तो फिर [परस्य सिद्धिः] चारों भूतों से भिन्न पाँचवें आत्मतत्त्व की सिद्धि [किं न] स्वभाव से क्यों नहीं मानी जाये? [अतावकानाम्] इस तत्त्वान्तर-सिद्धि को न मानने वाले जो अतावक हैं (दर्शनमोह के उदय से आकुलित-चित्त हुए, आप वीर जिनेन्द्र के मत से बाह्य हैं) उनका (जीविकामात्र-तन्त्र-विचारकों का) [अपि] भी [हा!] हाय! यह कैसा [प्रपातः] प्रपतन हुआ है (जो उन्हें संसार-समुद्र के आवर्त में गिराने वाला है) !!

  वर्णी 

वर्णी :

दृष्टेऽविशिष्टे जननादि हेतौ

विशिष्टता का प्रतिसत्त्वमेषाम् ।

स्वभावत: किं न परस्य सिद्धि

रतावकानामपि हा ! प्रपात: ॥36॥