
स्वच्छंदवृत्तेर्जगत: स्वभावात्-
उच्चैरनाचारपथेष्वदोषम् ।
निर्घुष्य दीक्षासममुक्तिमाना-
स्त्वद᳭दृष्टि बाह्या बत ! विभ्रमंति ॥37॥
अन्वयार्थ : [स्वभावात्] स्वभाव से ही [जगतः] जगत् की [स्वच्छन्दवृत्तेः] स्वच्छन्द-वृत्ति है, इसलिये जगत् के [उच्चैः] ऊंचे दर्जे के [अनाचारपथेषु] अनाचार-मार्गों में भी [अदोषं] कोई दोष नहीं है, ऐसी [निर्घुष्य] घोषणा करके [दीक्षासममुक्तिमानाः] दीक्षा के समकाल ही मुक्ति को मानकर जो अभिमानी हो रहे हैं, वे सब, हे वीर जिन! [त्वद्-दृष्टि-बाह्याः] आपकी दृष्टि से बाह्य हैं और [विभ्रमन्ति] केवल विभ्रम में पड़े हुए हैं [बत!] यह बड़े ही खेद अथवा कष्ट का विषय है ।
वर्णी
वर्णी :
स्वच्छंदवृत्तेर्जगत: स्वभावात्-
उच्चैरनाचारपथेष्वदोषम् ।
निर्घुष्य दीक्षासममुक्तिमाना-
स्त्वद᳭दृष्टि बाह्या बत ! विभ्रमंति ॥37॥
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