
प्रवृत्तिरक्तै: शमतुष्टिरिक्तै-
रूपेत्य हिंसाऽभ्युदयाङ्गनिष्ठा ।
प्रवृत्तितः शांतिरपि प्ररूढं
तम: परेषां तव सुप्रभातम् ॥38॥
अन्वयार्थ : [शम-तुष्टि-रिक्तैः] जो लोग शान्ति और सन्तुष्टि से शून्य हैं और इसलिये [प्रवत्तिरक्तैः] प्रवृत्ति-रक्त हैं उन के द्वारा [उपेत्य] स्वयं अपनाकर, [हिंसा अभ्युदयाङ्ग-निष्ठा] 'हिंसा स्वर्गादिक-प्राप्ति के हेतु की आधरभूत है' ऐसी जो मान्यता है, इसी तरह [प्रवृत्तितः शान्तिः अपि] 'प्रवृत्ति से शान्ति होती है' ऐसी जो मान्यता [प्ररूढं] प्रचलित की गई है, वह भी [परेषां] दूसरों का [तमः] घोर अन्धकार है । अतः [तव] आपका मत ही [सुप्रभातम्] सुप्रभातरूप है ।
वर्णी
वर्णी :
प्रवृत्तिरक्तै: शमतुष्टिरिक्तै-
रूपेत्य हिंसाऽभ्युदयाङ्गनिष्ठा ।
प्रवृत्तितः शांतिरपि प्ररूढं
तम: परेषां तव सुप्रभातम् ॥38॥
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