+ मीमांसक द्वारा मान्य हिंसादि से स्वर्ग की प्राप्ति मिथ्या -
प्रवृत्तिरक्तै: शमतुष्टिरिक्तै-
रूपेत्य हिंसाऽभ्युदयाङ्गनिष्ठा ।
प्रवृत्तितः शांतिरपि प्ररूढं
तम: परेषां तव सुप्रभातम् ॥38॥
अन्वयार्थ : [शम-तुष्टि-रिक्तैः] जो लोग शान्ति और सन्तुष्टि से शून्य हैं और इसलिये [प्रवत्तिरक्तैः] प्रवृत्ति-रक्त हैं (हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह में किसी प्रकार का नियम अथवा मर्यादा न रखकर उनमें प्रकर्षरूप से प्रवृत्त अथवा आसक्त हैं) उन (यज्ञवादी मीमांसकों) के द्वारा [उपेत्य] (प्रवृत्ति को) स्वयं अपनाकर, [हिंसा अभ्युदयाङ्ग-निष्ठा] 'हिंसा स्वर्गादिक-प्राप्ति के हेतु की आधरभूत है' ऐसी जो मान्यता है, इसी तरह [प्रवृत्तितः शान्तिः अपि] 'प्रवृत्ति से शान्ति होती है' ऐसी जो मान्यता [प्ररूढं] प्रचलित की गई है, वह भी [परेषां] दूसरों का (उनका) [तमः] घोर अन्धकार है । अतः [तव] (हे वीर जिन!) आपका मत ही [सुप्रभातम्] सुप्रभातरूप है ।

  वर्णी 

वर्णी :

प्रवृत्तिरक्तै: शमतुष्टिरिक्तै-

रूपेत्य हिंसाऽभ्युदयाङ्गनिष्ठा ।

प्रवृत्तितः शांतिरपि प्ररूढं

तम: परेषां तव सुप्रभातम् ॥38॥