+ प्रचलित अन्य मिथ्या मान्यतायें युक्तिपूर्ण नहीं -
शीर्षोपहारादि भिरात्मदुःखै-
र्देवान᳭किलाऽऽराध्य सुखाभिगृद्धा: ।
सिद्धयंति दोषाऽपचयाऽनपेक्षा-
युक्तं च तेषां त्वमृषिर्न येषाम् ॥39॥
अन्वयार्थ : [आत्म-दुःखैः] जीवात्मा के लिये दुःख के निमित्तभूत जो [शीर्षोपहारादिभिः] अपने या बकरे आदि के सिर की बलि चढ़ाना आदि के द्वारा [देवान्] देवों की [किल आराध्य] आराधना करके केवल वे ही लोग [सिद्धयंति] सिद्ध होते हैं - अपने को सिद्ध समझते हैं या घोषित करते हैं - जो [दोषाऽपचयाऽनपेक्षा] दोषों के विनाश की अपेक्षा नहीं रखते और [सुखाभिगृद्धाः] काम-सुखादि के लोलुपी हैं [तेषां च] और यह बात उन्हीं के लिए [युक्तं] युक्त है [येषां] जिनके, हे वीर जिन! [त्वं] आप [ऋषिः] गुरु [न] नहीं हैं ।

  वर्णी 

वर्णी :

शीर्षोपहारादि भिरात्मदुःखै-

र्देवान᳭किलाऽऽराध्य सुखाभिगृद्धा: ।

सिद्धयंति दोषाऽपचयाऽनपेक्षा-

युक्तं च तेषां त्वमृषिर्न येषाम् ॥39॥