+ विशेष सामान्यनिष्ठ है अतः वस्तु सामान्य-विशेषात्मक -
सामान्यनिष्ठा विविधा विशेषा
पदं विशेषांतर पक्षपाति ।
अंतर्विशेषांतर र्वृत्तितोऽन्यत᳭
समानभावं नयते विशेषम् ॥40॥
अन्वयार्थ : [विविधः विशेषाः] जो विविध् (अनेक प्रकार के) विशेष हैं, वे सब [सामान्य-निष्ठाः] सामान्यनिष्ठ हैं। [पदं] (वर्णसमूहरूप) पद जो कि [विशेषान्तरपक्षपाति] विशेषान्तर का पक्षपाती (स्वीकार करने वाला) होता है वह विशेष को प्राप्त कराता है। साथ ही [अन्तर्विशेषान्तर्वृत्तितः] विशेषान्तरों के अन्तर्गत उसकी (पद की) वृत्ति होने से [अन्यत्] दूसरे (जात्यात्मक) [विशेषं] विशेष को [समानभावं] सामान्य रूप में भी [नयते] प्राप्त कराता है ।

  वर्णी 

वर्णी :

सामान्यनिष्ठा विविधा विशेषा

पदं विशेषांतर पक्षपाति ।

अंतर्विशेषांतर र्वृत्तितोऽन्यत᳭

समानभावं नयते विशेषम् ॥40॥