+ 'एवकार' एकान्तिक पक्ष होने से वस्तु का अभाव -
यदेवकारोपहितं पदं तद᳭-
अस्वार्थत: स्वार्थमवच्छिनत्ति ।
पर्यायसामान्यविशेष सर्वं
पदार्थहानिश्च विरोधिवत्स्यात् ॥41॥
अन्वयार्थ : [यत्पदं] जो पद [एवकारोपहितं] एवकार - 'एव' नाम के निपात - से उपहित (युक्त) है [तद्] वह (जैसे) [अस्वार्थतः] अस्वार्थ से (अजीवत्व से) [स्वार्थम्] स्वार्थ को (जीवत्व को) [अवच्छिनत्ति] अलग करता है (व्यवच्छेदक है), (वैसे ही) [पर्याय-सामान्य-विशेषसर्वं] सब स्वार्थ-पर्यायों, स्वार्थ-सामान्यों और स्वार्थ-विशेषों को भी अलग करता है। [च पदार्थहानिः] और इससे पदार्थ की (जीवपद के अभिधेयरूप जीवत्व की) भी हानि उसी प्रकार ठहरती है [विरोधिवत्] जिस प्रकार कि विरोधी (अजीवत्व) की हानि [स्यात्] होती है ।

  वर्णी 

वर्णी :

यदेवकारोपहितं पदं तद᳭-

अस्वार्थत: स्वार्थमवच्छिनत्ति ।

पर्यायसामान्यविशेष सर्वं

पदार्थहानिश्च विरोधिवत्स्यात् ॥41॥