
अनुक्ततुल्यं यदनेवकारं
व्यावृत्यभावान्नियमद्वयेऽपि ।
पर्यायभावेऽन्यतरप्रयोग-
स्तत्सर्वमन्यच्युतमात्महीनम् ॥42॥
अन्वयार्थ : [यत्] जो पद [अनेवकारं] एवकार से रहित है वह [अनुक्ततुल्यं] नहीं कहे हुए के समान है, क्योंकि उससे [नियमद्वयेऽपि] नियम-द्वय के इष्ट होने पर भी [व्यावृत्यभावात्] व्यावृत्ति का अभाव होता है तथा [पर्यायभावे] पर्यायभाव ठहरता है, [अन्यतरप्रयोगः] चाहे जिस पद का कोई प्रयोग कर सकता है और [तत् सर्वं] सम्पूर्ण [अन्यच्युतं] और जो प्रतियोगी से रहित होता है)वह [आत्महीनम्] अपने स्वरूप से रहित होता है।
वर्णी
वर्णी :
अनुक्ततुल्यं यदनेवकारं
व्यावृत्यभावान्नियमद्वयेऽपि ।
पर्यायभावेऽन्यतरप्रयोग-
स्तत्सर्वमन्यच्युतमात्महीनम् ॥42॥
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