
विरोधि चाऽभेद्यविशेषभावात्-
तद᳭द्योतन: स्याद᳭गुणतो निपात: ।
विपाद्यसंधिश्च तथाऽङ्गभावा-
दवाच्यता श्रायसलोपहेतु: ॥43॥
अन्वयार्थ : [च] और यदि पद [अभेदि] एक ही है तो [विरोधि] यह कथन विरोधी है , क्योंकि [अविशेषभावात्] किसी भी विशेष का तब अस्तित्व बनता ही नहीं है। [तद्द्योतनः] उस विरोधी धर्म का द्योतक [स्यात्] 'स्यात्' नाम का [निपातः] शब्द है जो [गुणतः] गौणरूप से उस धर्म का द्योतन करता है, [च] साथ ही [विपाद्यसन्धिः] विपक्षभूत धर्म के संयोजना-स्वरूप होता है, क्योंकि [तथाऽङ्गभावात्] दोनों में अंगपना है । [अवाच्यता] सर्वथा अवक्तव्यता तो [श्रायसलोपहेतुः] आत्महित के लोप की कारण है ।
वर्णी
वर्णी :
विरोधि चाऽभेद्यविशेषभावात्-
तद᳭द्योतन: स्याद᳭गुणतो निपात: ।
विपाद्यसंधिश्च तथाऽङ्गभावा-
दवाच्यता श्रायसलोपहेतु: ॥43॥
|