
तथा प्रतिज्ञाऽऽशयतोऽप्रयोग:
सामर्थ्यतो वा प्रतिषेधयुक्ति: ।
इति त्वदीया जिननाग ! दृष्टिः
पराऽप्रधृष्या परधर्षिणी च ॥44॥
अन्वयार्थ : [अप्रयोगः] जो अप्रयोग है [तथा] उस प्रकार का [प्रतिज्ञाऽऽशयतः] प्रतिज्ञा में प्रतिपादन करने वाले का अभिप्राय सन्निहित है । [वा] अथवा [प्रतिषेध-युक्तिः] सर्वथा एकान्त के व्यवच्छेद की युक्ति [सामर्थ्यतः] सामर्थ्य से ही घटित हो जाती है । [इति] इस प्रकार [जिननाग] हे जिनश्रेष्ठ वीर भगवन्! [त्वदीया दृष्टिः] आपकी दृष्टि [पराऽप्रधृष्या] दूसरों के द्वारा अबाधित-विषया है [च] और साथ ही [परधर्षिणी] दूसरे भावैकान्तादि-वादियों की दृष्टि को तिरस्कृत करने वाली है ।
वर्णी
वर्णी :
तथा प्रतिज्ञाऽऽशयतोऽप्रयोग:
सामर्थ्यतो वा प्रतिषेधयुक्ति: ।
इति त्वदीया जिननाग ! दृष्टिः
पराऽप्रधृष्या परधर्षिणी च ॥44॥
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