
विधिर्निषेधोऽनभिलाप्यता च
त्रिरेकशस्त्रिर्द्विश एक एव ।
त्रयो विकल्पास्तव सप्तधाऽमी
स्याच्छब्दनेया: सकलेऽर्थभेदे ॥45॥
अन्वयार्थ : [विधिः] अस्ति, [निषेधः] नास्ति [च] और [अनभिलाप्यता] अवक्तव्यता - ये [एकशः] एक-एक करके [त्रिः] तीन मूल विकल्प हैं । [द्विशः] द्विसंयोजक [त्रिः] तीन विकल्प होते हैं । और [त्रायः] त्रिसंयोजक [एक एव] एक ही विकल्प है । इस तरह से [अमी] ये [सप्तध] सात [विकल्पाः] विकल्प, हे वीर जिन! [सकले] सम्पूर्ण [अर्थभेदे] अर्थभेद में [तव] आपके यहाँ घटित होते हैं और ये सब विकल्प [स्यात्शब्दनेयाः] 'स्यात्' शब्द के द्वारा नेय हैं ।
वर्णी
वर्णी :
विधिर्निषेधोऽनभिलाप्यता च
त्रिरेकशस्त्रिर्द्विश एक एव ।
त्रयो विकल्पास्तव सप्तधाऽमी
स्याच्छब्दनेया: सकलेऽर्थभेदे ॥45॥
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