
स्यादित्यपि स्याद᳭गुणमुख्यकल्पै-
कांतोयथोपाधिविशेषवीक्ष्य: ।
तत्त्वं त्वनेकांतमशेष रूपं
द्विधा भवार्थव्यवहारवत्त्वात् ॥46॥
अन्वयार्थ : 'स्यात्' [इत्यपि] यह शब्द भी [गुण-मुख्य-कल्पैकान्तः] गुण और मुख्य स्वभावों के द्वारा कल्पित किये हुए एकान्तों को लिये हुए [स्यात्] होता है, [यथोपाधि विशेषवीक्ष्यः] क्योंकि वह यथोपाधि विशेष का द्योतक होता है। [तत्त्वं] तत्त्व [तु] तो [अशेषरूपं] सम्पूर्ण रूप से [अनेकान्तम्] अनेकान्त है और [द्विधा] वह तत्त्व दो प्रकार से व्यवस्थित है, [भवार्थ-व्यवहारवत्त्वात्] एक भवार्थवान् होने से और दूसरा व्यवहारवान् होने से ।
वर्णी
वर्णी :
स्यादित्यपि स्याद᳭गुणमुख्यकल्पै-
कांतोयथोपाधिविशेषवीक्ष्य: ।
तत्त्वं त्वनेकांतमशेष रूपं
द्विधा भवार्थव्यवहारवत्त्वात् ॥46॥
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