
न द्रव्यपर्याय पृथग᳭व्यवस्था
द्वैयात्म्यमेकाऽर्पणया विरुद्धम् ।
धर्मी च धर्मश्च मिथस्त्रिधेमौ
न सर्वथा तेऽभिमतौ विरुद्धो ॥47॥
अन्वयार्थ : [न द्रव्य-पर्याय-पृथग्व्यवस्था] न सर्वथा द्रव्य की, न सर्वथा पर्याय की और न सर्वथा प्रथग्भूत द्रव्य-पर्याय की ही कोई व्यवस्था बनती है। यदि [द्वैयात्म्यं] सर्वथा द्वयात्मक एक तत्त्व माना जाये तो यह सर्वथा द्वैयात्म्य [एकार्पणया] एक की अर्पणा से [विरुद्धम्] विरुद्ध पड़ता है । किन्तु [ते] आपके [अभिमतौ] मत में [धर्मी च धर्मः च] ये द्रव्य और पर्याय [मिथः] परस्पर में [त्रिध इमौ] असर्वथारूप से तीन प्रकार - भिन्न, अभिन्न तथा भिन्नाभिन्न - माने गये हैं और [न सर्वथा विरुद्धौ] सर्वथा विरुद्ध नहीं हैं ।
वर्णी
वर्णी :
न द्रव्यपर्याय पृथग᳭व्यवस्था
द्वैयात्म्यमेकाऽर्पणया विरुद्धम् ।
धर्मी च धर्मश्च मिथस्त्रिधेमौ
न सर्वथा तेऽभिमतौ विरुद्धो ॥47॥
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