+ वीर शासन की 'युक्त्यनुशासन' ही सार्थक संज्ञा -
दृष्टाऽऽगमाभ्यामविरुद्धमर्थ-
प्ररूपणं युक्त्यनुशासनं ते ।
प्रतिक्षणं स्थित्युदयव्ययात्म-
तत्त्वव्यवस्थं सदिहाऽर्थरूपम् ॥48॥
अन्वयार्थ : [दृष्टागमाभ्यां] प्रत्यक्ष (दृष्ट) और आगम से [अविरुद्धं] अविरोधरूप [अर्थप्ररूपणं] अर्थ (वस्तु) रूप से प्ररूपण है उसे [युक्त्यनुशासनं] युक्त्यनुशासन कहते हैं और वही [ते] (हे वीर भगवन्!) आपको अभिमत है। [इह] यहाँ [अर्थरूपं] अर्थ (वस्तु) का रूप [प्रतिक्षणं] प्रतिक्षण [स्थित्युदय-व्ययात्मतत्त्व-व्यवस्थं] स्थिति (ध्रौव्य), उदय (उत्पाद) और व्यय (नाश) रूप तत्त्व-व्यवस्था को लिये हुए है, क्योंकि वह [सत्] सत् है।

  वर्णी 

वर्णी :

दृष्टाऽऽगमाभ्यामविरुद्धमर्थ-

प्ररूपणं युक्त्यनुशासनं ते ।

प्रतिक्षणं स्थित्युदयव्ययात्म-

तत्त्वव्यवस्थं सदिहाऽर्थरूपम् ॥48॥