
नानात्मतामप्रजहत्तदेक-
मेकात्मतामप्रजहच्च नाना ।
अङ्गांङ्गिभावात्तव वस्तु तद्यत्
क्रमेण वाग्वाच्यमनन्तरूपम् ॥49॥
अन्वयार्थ : [तव] आपके शासन में जो [वस्तु] वस्तु [एकम्] एक है [तद् नानात्मताम्] वह अनेकरूपता का [अप्रजहत्] त्याग न करती हुई ही वस्तुतत्त्व को प्राप्त होती है। [च] और जो वस्तु [नाना] नानात्मक प्रसिद्ध है वह [एकात्मताम्] एकात्मता को [अप्रजहत्] न छोड़ती हुई ही वस्तुस्वरूप से अभिमत है। [यत् अनन्तरूपम्] वस्तु जो अनन्तरूप है, [तत्] वह [अङ्गांङ्गिभावात्] अङ्ग-अङ्गी भाव के कारण [क्रमेण] क्रम से [वाग्वाच्यम्] वचन-गोचर है ।
वर्णी
वर्णी :
नानात्मतामप्रजहत्तदेक-
मेकात्मतामप्रजहच्च नाना ।
अङ्गांङ्गिभावात्तव वस्तु तद्यत्
क्रमेण वाग्वाच्यमनन्तरूपम् ॥49॥
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