+ एकानेक रूप वस्तु की सिद्धि -
नानात्मतामप्रजहत्तदेक-
मेकात्मतामप्रजहच्च नाना ।
अङ्गांङ्गिभावात्तव वस्तु तद्यत्
क्रमेण वाग्वाच्यमनन्तरूपम् ॥49॥
अन्वयार्थ : (हे वीर जिन!) [तव] आपके शासन में जो [वस्तु] (जीवादि) वस्तु [एकम्] एक है (सत्वरूप एकत्व-प्रत्यभिज्ञान का विषय होने से) [तद् नानात्मताम्] वह (समीचीन नाना-ज्ञान का विषय होने से) अनेकरूपता का [अप्रजहत्] त्याग न करती हुई ही वस्तुतत्त्व को प्राप्त होती है। [च] और (इसी तरह) जो वस्तु (अबाधित नाना-ज्ञान का विषय होने से) [नाना] नानात्मक प्रसिद्ध है वह [एकात्मताम्] एकात्मता को [अप्रजहत्] न छोड़ती हुई ही वस्तुस्वरूप से अभिमत है। [यत् अनन्तरूपम्] वस्तु जो अनन्तरूप है, [तत्] वह [अङ्गांङ्गिभावात्] अङ्ग-अङ्गी भाव के कारण (गुण-मुख्य की विवक्षा को लेकर) [क्रमेण] क्रम से [वाग्वाच्यम्] वचन-गोचर है ।

  वर्णी 

वर्णी :

नानात्मतामप्रजहत्तदेक-

मेकात्मतामप्रजहच्च नाना ।

अङ्गांङ्गिभावात्तव वस्तु तद्यत्

क्रमेण वाग्वाच्यमनन्तरूपम् ॥49॥