
मिथोऽनपेक्षा: पुरुषार्थहेतु-
र्नांशा न चांशी पृथगस्ति तेभ्य: ।
परस्परेक्षा: पुरुषार्थहेतु-
र्दृष्टा नयास्तद्वदसिक्रियायाम् ॥50॥
अन्वयार्थ : [अंशाः] जो अंश [मिथोऽनपेक्षाः] परस्पर-निरपेक्ष हैं वे [पुरुषार्थहेतुः] पुरुषार्थ के हेतु [न] नहीं हो सकते [च] और [अंशी] अंशी [तेभ्यः] उन अंशो से [पृथक् न अस्ति] पृथक् नहीं है। [तद्वत्] अंश-अंशी की तरह [परस्परेक्षाः] परस्पर-सापेक्ष [नयाः] नय [असिक्रियायाम्] असिक्रिया में [पुरुषार्थहेतुः] पुरुषार्थ के हेतु हैं, क्योंकि [दृष्टाः] देखे जाते हैं ।
वर्णी
वर्णी :
मिथोऽनपेक्षा: पुरुषार्थहेतु-
र्नांशा न चांशी पृथगस्ति तेभ्य: ।
परस्परेक्षा: पुरुषार्थहेतु-
र्दृष्टा नयास्तद्वदसिक्रियायाम् ॥50॥
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