+ अन्य दर्शनों में मान्य सामान्य-विशेष के स्वरूप से वस्तु स्वरूप की सिद्धि नहीं -
व्यावृत्तिहीनान्वयतो न सिद्ध᳭येद्,
विपर्ययेऽप्यद्वितयेऽपि साध्यम् ।
अतद᳭व्युदासाभिनिवेशवाद:,
पराभ्युपेतार्थविरोधवाद: ॥56॥
अन्वयार्थ : [साध्यं] यदि साध्य (सत्तारूप परसामान्य अथवा द्रव्यत्वादिरूप अपरसामान्य) को [व्यावृत्ति-हीनाऽन्वयतः] व्यावृत्तिहीन अन्वय से सिद्ध माना जाये तो वह [न सिध्येत्] सिद्ध नहीं होता है । [विपर्यये अपि] यदि इसके विपरीत अन्वयहीन व्यावृत्ति से साध्य (सामान्य) को सिद्ध माना जाये तो वह भी नहीं बनता । (यदि यह कहा जाये कि) [अद्वितये अपि] अन्वय और व्यावृत्ति दोनों से हीन जो अद्वितयरूप हेतु है (उससे सन्मात्रा का प्रतिभासन होने से सत्ताद्वैतरूप सामान्य की सिद्धि होती है) [न सिध्येत्] तो इस प्रकार भी यह सिद्धि नहीं है। [अतद्व्युदासाभिनिवेशवादः] यदि अद्वितय को संवित्तिमात्रा (ज्ञानमात्रा) के रूप में मानकर असाधनव्यावृत्ति से साधन को और असाध्यव्यावृत्ति से साध्य को अतद्व्युदास-अभिनिवेशवाद (अनधिकृत के प्रतिषेध-रूप दृढ़ निश्चयवाद) के रूप में आश्रित किया जाये तब भी (बौद्धों के मत में) [पराऽभ्युपेताऽर्थविरोध्वादः] पर के द्वारा स्वीकृत वस्तु तत्त्व के विरोधवाद का प्रसंग आता है ।

  वर्णी 

वर्णी :

व्यावृत्तिहीनान्वयतो न सिद्ध᳭येद्,

विपर्ययेऽप्यद्वितयेऽपि साध्यम् ।

अतद᳭व्युदासाभिनिवेशवाद:,

पराभ्युपेतार्थविरोधवाद: ॥56॥