
व्यावृत्तिहीनान्वयतो न सिद्ध᳭येद्,
विपर्ययेऽप्यद्वितयेऽपि साध्यम् ।
अतद᳭व्युदासाभिनिवेशवाद:,
पराभ्युपेतार्थविरोधवाद: ॥56॥
अन्वयार्थ : [साध्यं] यदि साध्य को [व्यावृत्ति-हीनाऽन्वयतः] व्यावृत्तिहीन अन्वय से सिद्ध माना जाये तो वह [न सिध्येत्] सिद्ध नहीं होता है । [विपर्यये अपि] यदि इसके विपरीत अन्वयहीन व्यावृत्ति से साध्य को सिद्ध माना जाये तो वह भी नहीं बनता । [अद्वितये अपि] अन्वय और व्यावृत्ति दोनों से हीन जो अद्वितयरूप हेतु है [न सिध्येत्] तो इस प्रकार भी यह सिद्धि नहीं है। [अतद्व्युदासाभिनिवेशवादः] यदि अद्वितय को संवित्तिमात्रा के रूप में मानकर असाधनव्यावृत्ति से साधन को और असाध्यव्यावृत्ति से साध्य को अतद्व्युदास-अभिनिवेशवाद के रूप में आश्रित किया जाये तब भी [पराऽभ्युपेताऽर्थविरोध्वादः] पर के द्वारा स्वीकृत वस्तु तत्त्व के विरोधवाद का प्रसंग आता है ।
वर्णी
वर्णी :
व्यावृत्तिहीनान्वयतो न सिद्ध᳭येद्,
विपर्ययेऽप्यद्वितयेऽपि साध्यम् ।
अतद᳭व्युदासाभिनिवेशवाद:,
पराभ्युपेतार्थविरोधवाद: ॥56॥
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