+ निःस्वभावभूत संवृतिरूप साधन से संवृतिरूप साध्य की सिद्धि की युक्ति वस्तु स्वरूप के निर्धरण में असमर्थ -
अनात्मनाऽनात्मगतेरयुक्ति-
र्वस्तुन्ययुक्तेर्यदि पक्षसिद्धि: ।
अवस्त्वयुक्ते: प्रतिपक्षसिद्धि:,
न च स्वयं साधनरिक्तसिद्धि: ॥57॥
अन्वयार्थ : [अनात्मना] अनात्मा (निःस्वभाव संवृतिरूप तथा असाधन की व्यावृत्तिमात्रारूप) साधन के द्वारा [अनात्मगतेः] (उसी प्रकार के) अनात्मसाध्य की जो गति-प्रतिपत्ति (बोध, जानकारी) है उसकी सर्वथा [अयुक्तिः] अयुक्ति (अयोजना) है (वह बनती ही नहीं है)[यदि] यदि [वस्तुनि] वस्तु में [अयुक्तेः] (अनात्मसाधन के द्वारा अनात्मसाध्य की गति की) अयुक्ति से [पक्षसिद्धिः] पक्ष की सिद्धि मानी जाये तो [अवस्त्वयुक्तेः] अवस्तु में साधन-साध्य की अयुक्ति से [प्रतिपक्षसिद्धिः] प्रतिपक्ष की (द्वैत की) भी सिद्धि ठहरती है [च स्वयं] और यदि स्वतः ही [साधनरिक्तसिद्धिः] साधन के बिना (संवेदनाद्वैतरूप साध्य की) सिद्धि मानी जाये तो वह [न] युक्त नहीं है ।

  वर्णी 

वर्णी :

अनात्मनाऽनात्मगतेरयुक्ति-

र्वस्तुन्ययुक्तेर्यदि पक्षसिद्धि: ।

अवस्त्वयुक्ते: प्रतिपक्षसिद्धि:,

न च स्वयं साधनरिक्तसिद्धि: ॥57॥