+ संवेदनाद्वैत स्वपक्ष का घातक -
निशायितस्तैः परशु: परघ्न:,
स्वमूर्ध्नि निर्भेदभयाऽनभिज्ञै: ।
वैतण्डिकैर्यै: कुसृति: प्रणीता,
मुने! भवच्छासनदृक᳭प्रमूढै: ॥58॥
अन्वयार्थ : (इस तरह) [मुने!] हे वीर भगवन्! [यैः वैतण्डिकैः] जिन वैतण्डिकों ने (परपक्ष के दूषण की प्रधनता अथवा एकमात्रा धुन को लिये हुए संवेदनाद्वैतवादियों ने) [कुसृतिः] कुत्सिता गति-प्रतीति (कुमार्ग) का [प्रणीता] प्रणयन किया है, [तैः] उन [भवच्छासन-दृक्-प्रमूढैः] आपके (स्याद्वाद) शासन की दृष्टि से प्रमूढ एवं [निर्भेदभयाऽनभिज्ञैः] निर्भेद के भय से अनभिज्ञ जनों ने (दर्शनमोह के उदय से आक्रान्त होने के कारण) [परघ्नः] परघातक [परशुः] परशु-कुल्हाडे़ को [स्वमूख्रध्न] अपने ही मस्तक पर [निशायितः] मारा है !

  वर्णी 

वर्णी :

निशायितस्तैः परशु: परघ्न:,

स्वमूर्ध्नि निर्भेदभयाऽनभिज्ञै: ।

वैतण्डिकैर्यै: कुसृति: प्रणीता,

मुने! भवच्छासनदृक᳭प्रमूढै: ॥58॥