
निशायितस्तैः परशु: परघ्न:,
स्वमूर्ध्नि निर्भेदभयाऽनभिज्ञै: ।
वैतण्डिकैर्यै: कुसृति: प्रणीता,
मुने! भवच्छासनदृक᳭प्रमूढै: ॥58॥
अन्वयार्थ : [मुने!] हे वीर भगवन्! [यैः वैतण्डिकैः] जिन वैतण्डिकों ने [कुसृतिः] कुत्सिता गति-प्रतीति का [प्रणीता] प्रणयन किया है, [तैः] उन [भवच्छासन-दृक्-प्रमूढैः] आपके शासन की दृष्टि से प्रमूढ एवं [निर्भेदभयाऽनभिज्ञैः] निर्भेद के भय से अनभिज्ञ जनों ने [परघ्नः] परघातक [परशुः] परशु-कुल्हाडे़ को [स्वमूख्रध्न] अपने ही मस्तक पर [निशायितः] मारा है !
वर्णी
वर्णी :
निशायितस्तैः परशु: परघ्न:,
स्वमूर्ध्नि निर्भेदभयाऽनभिज्ञै: ।
वैतण्डिकैर्यै: कुसृति: प्रणीता,
मुने! भवच्छासनदृक᳭प्रमूढै: ॥58॥
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