+ सर्वशून्यतारूप अभावैकान्त से वस्तु स्वरूप की सिद्धि संभव नहीं -
भवत्यभावोपि च वस्तुधर्मो
भावांतरं भाववदर्हतस्ते ।
प्रमीयते च व्यपदिश्यते च
वस्तुव्यवस्थांगममेयमन्यत् ॥59॥
अन्वयार्थ : [ते अर्हतः] हे वीर अर्हन्! आपके मत में [अभावः अपि] अभाव भी [वस्तुधर्मः] वस्तुधर्म [भवति] होता है [च] और यदि वह अभाव (धर्म का अभाव न होकर धर्मी का अभाव है) तो वह [भाववत्] भाव की तरह [भावान्तरं] भावान्तर होता है। (इस सब का कारण यह है कि) [च प्रमीयते] अभाव को प्रमाण से जाना जाता है और [व्यपदिश्यते च] कथन किया जाता है और [वस्तुव्यवस्थाऽङ्गम्] वस्तु-व्यवस्था के अंगरूप में निर्दिष्ट किया जाता है । [अन्यत्] इससे भिन्न अभाव (जो अभाव-तत्त्व / सर्वशून्यता वस्तु-व्यवस्था का अंग नहीं है, वह भाव-एकान्त की तरह) [अमेयम्] अमेय (अप्रमेय) ही है अर्थात् किसी भी प्रमाण के गोचर नहीं है ।

  वर्णी 

वर्णी :

भवत्यभावोपि च वस्तुधर्मो

भावांतरं भाववदर्हतस्ते ।

प्रमीयते च व्यपदिश्यते च

वस्तुव्यवस्थांगममेयमन्यत् ॥59॥