+ स्याद्वाद शासन सभी की उन्नति का साध्क-रूप 'सर्वोदय' तीर्थ -
सर्वान्तवत्तद᳭गुणमुख्यकल्पं
सर्वान्तशून्यं च मिथोऽनपेक्षम् ।
सर्वापदामन्तकरं निरन्तं
सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव ॥61॥
अन्वयार्थ : हे वीर भगवन्! [तव] आपका [इदं] यह [तीर्थं] तीर्थ (प्रवचनरूप शासन, अर्थात् परमागम वाक्य, जिसके द्वारा संसार-महासमुद्र को तिरा जाता है) [एव] ही [सर्वान्तवत्तद्गुणमुख्यकल्पं] सर्वान्तवान् है (सामान्य-विशेष, द्रव्य-पर्याय, विधि्-निषेध्, एक-अनेक आदि सभी धर्मों को लिये हुए है) और गौण तथा मुख्य की कल्पना को साथ में लिये हुए है। जो शासन-वाक्य धर्मों में) [मिथोऽनपेक्षं] पारस्परिक अपेक्षा का प्रतिपादन नहीं करता (उन्हें सर्वथा निरपेक्ष बतलाता है वह) [सर्वान्तशून्यं] सर्व धर्मों से शून्य है । (अतः आपका यह शासन-तीर्थ ही) [सर्वापदाम्] सर्व आपदाओं (दुःखों) का [अन्तकरं] अन्त करने वाला है, यही [निरन्तं] (किसी भी मिथ्यादर्शन के द्वारा) खण्डनीय नहीं है [च] और यही [सर्वोदयं] सब प्राणियों के अभ्युदय का साधक, ऐसा सर्वोदय-तीर्थ है ।

  वर्णी 

वर्णी :

सर्वान्तवत्तद᳭गुणमुख्यकल्पं

सर्वान्तशून्यं च मिथोऽनपेक्षम् ।

सर्वापदामन्तकरं निरन्तं

सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव ॥61॥