+ हे वीर जिन! आपके शासन में श्रद्धान करने वाला अभद्र भी समन्तभद्र हो जाता है -
कामं द्विषन्नप्युपपत्तिचक्षु:
समीक्ष्यतां ते समदृष्टिरिष्टम् ।
त्वयि ध्रुवं खण्डित मानशृङ्गो,
भवत्यभद्रोपि समंतभद्रः ॥62॥
अन्वयार्थ : (हे वीर जिन!) [ते] आपके [इष्टं] इष्ट-शासन से [कामं] यथेष्ट (भरपेट) [द्विषन् अपि] द्वेष रखने वाला मनुष्य भी यदि [समदृष्टिः] समदृष्टि (मध्यस्थवृत्ति) हुआ, [उपपत्तिचक्षुः] मात्सर्य (विद्वेष) के त्यागपूर्वक युक्तिसंगत समाधन की दृष्टि से [त्वयि] आपके इष्ट का (शासन का) [समीक्ष्यतां] अवलोकन और परीक्षण करता है तो [ध्रुवं] अवश्य ही [खण्डितमानश्रृङ्गः] उसका मान-शिखर खण्डित हो जाता है और वह [अभद्रः अपि] अभद्र अथवा मिथ्यादृष्टि होता हुआ भी [समन्तभद्रः] सब ओर से भद्ररूप एवं सम्यग्दृष्टि [भवति] बन जाता है ।

  वर्णी 

वर्णी :

कामं द्विषन्नप्युपपत्तिचक्षु:

समीक्ष्यतां ते समदृष्टिरिष्टम् ।

त्वयि ध्रुवं खण्डित मानशृङ्गो,

भवत्यभद्रोपि समंतभद्रः ॥62॥