+ कोई भी नय उभयवाद का प्रतिपादक नहीं -
सव्वणयसमूहम्मि वि णत्थि णओ उभयवायपण्णवओ ।
मूलणयाण उ आणं पत्तेयं विसेसियं बिंति ॥16॥
सर्वनयसमूहेऽपि नास्ति नय उभयवाद-प्रज्ञापक: ।
मूलनयाभ्यां तु ज्ञातं प्रत्येकं विशेषितं ब्रुवन्ति ॥16॥
अन्वयार्थ : [सव्वणयसमूहम्मि] सब नयों (के) समूह में [वि] भी [उभयवायपण्णवओ] उभयवाद (का) प्रतिपादक [णयो] नय [णत्थि] नहीं है [उ] किन्तु [मूलणयाण] मूल नयों (के) द्वारा [णाअं] जाने (विषय को) [विसेसियं] विशेष (रूप से) [पत्तेयं] प्रत्येक (नय) [बेंति] कहते हैं ।
Meaning : Among all the subsequent Nayas, there is not a single Naya which has for its province both the aspects of a thing viz. the general and the particular-in their entirety. The reason is that all these Nayas look at the different aspects of the thing or Reality viewed by the principal Nayas.

  विशेष