+ समन्वित ही सुनय -
जहऽणेयलक्खणगुणा वेरुलियाई मणी विसंजुत्ता ।
रयणावलिववएसं न लहंति महग्घमुल्ला वि ॥22॥
तह णिययवायसुविणिच्छिया वि अण्णोण्णपक्खणिरवेक्खा ।
सम्मद्दंसणसद्दं सव्वे वि णया ण पावेंति ॥23॥
जह पुण ते चेव मणी जहा गुणविसेसभागपडिबद्धा ।
'रयणावलि'त्ति भएणइ जहंति पाडिक्कसण्णाउ ॥24॥
तह सव्वे णयवाया जहाणुरूवविणिउत्तवत्तव्वा ।
सम्मद्दंसणसद्दं लहन्ति ण विसेससण्णाओ ॥25॥
यथानेकलक्षणगुणा वेडूर्यादिमणयो विसंयुक्ता: ।
रत्नावलिव्यपदेशं न लभन्ते महर्घमूल्या अपि ॥22॥
तथा निजकवाद-सुविनिश्चता अप्यन्योन्यपक्षनिरपेक्षा: ।
सम्यग्दर्शनशब्दं सर्वेऽपि नया न प्राप्नुवन्ति ॥23॥
यथा पुनस्ते चैव मणयो यथागुणविशेषभागप्रतिबद्धा: ।
रत्नावलीति भण्यते जहाति प्रत्येकसंज्ञा: ॥24॥
तथा सर्वे नयवादा यथानुरूपविनियुक्तवक्तव्या: ।
सम्यग्दर्शनशब्दं लभन्ते न विशेषसंज्ञा: ॥25॥
अन्वयार्थ : [जह] जिस प्रकार [णेग] अनेक [लक्खणगुणा] लक्षण (और) गुण (वाले) [वेरुलियाई मणी] वैडूर्य मणि [महग्धमुल्ला] बहुत मूल्य (वाले) [वि] भी [विसंजुत्ता] बिखरे हुए (पिरोये हुए, संयुक्त नहीं होने से) [रयणावलिववएसं] रत्नावली नाम (व्यवहार को) [ण] नहीं [लहंति] प्राप्त (करते) हैं ।
[तह] उसी प्रकार [णिययवायसुविणिच्छिया] अपने (अपने) वाद (पक्ष में) सुनिश्चित (होने पर) [वि] भी [अण्णोण्णपक्खणिरवेक्खा] एक-दूसरे (के) पक्ष (के साथ) निरपेक्ष (होने से) [सव्वे] सब [वि] ही [णया] नय [सम्महंसणसइं] सम्यक्‌दर्शन शब्द को [ण] नहीं [पारवंति] पाते हैं ।
[जह पुण] जैसे फिर [ते चेव] वे ही [मणी जहागुणविसेसभाग पडिबद्धा] जहाँ (जब) धागे विशेष (में) पिरो दी जाती हैं तो [रयणावलि] रत्नावली (रत्नों का हार) [त्ति] यह [भण्णइ] कही जाती है (और) [पाडिक्कसण्णाओ] प्रत्येक (अपने-अपने) संज्ञा (नाम को, मणि इस नाम को) [जहति] छोड़ देती है ।
[तह] उसी प्रकार [सव्वे] सब [णयवाया] नयवाद [जहाणुरूवविणिउत्तवत्तव्वा] यथानुरूप वचनों (में) विनियुक्त (प्रकट होने वाले) [सम्मदंसणसद्दं] सम्यग्दर्शन शब्द(को) [लहंति] प्राप्त करते हैं [विसेससण्णाओ] विशेष संज्ञा(वाले हो कर) [ण] नहीं ।
Meaning : Just as emerald and other jewels of rare quality and of excellent kind do not acquire the designation of a necklace of jewels even though all of them be priceless jewels on account of their lying unconnected with or disunited with each other, similarly every Naya in its own sphere is right, but if all of them arrogate to themselves the whole truth and disregard the views of rival Naya then they do not attain the status of a right view.
Moreover, just as those jewels unite with each other and occupy the place that is assigned to them individually in the string, they, all together, attain the designation of a necklace of jewels, disowning their individual names.
Similarly if all the Nayas arrange themselves in a proper way and supplement to each other, then alone they are worthy of being termed as the whole truth SamyagDarsana or the right view in its entirety. But in this case they merge their individuality in the collective whole.

  विशेष