+ दोनों नयों की विषय-मर्यादा -
दव्वट्ठियवत्तव्वं सव्वं सव्वेण णिच्चमवियप्पं ।
आरद्धो य विभागो पज्जववत्तव्वमग्गो य ॥29॥
द्रव्यार्थिक-वक्तव्यं सर्व सर्वेण नित्यमविकल्पम्‌ ।
आरब्धश्च विभागो पर्यववक्तव्यमार्गश्च ॥29॥
अन्वयार्थ : [सव्वं] सब [सव्वेण] सब तरह से [णिच्चमवियप्पं] नित्य (और) अविकल्प (भेदरहित) [दव्वट्ठियवत्तव्वं] द्रव्यार्थिक (नय का) वक्तव्य है [य] और [विभागो] भेद के [आरद्धो] आरम्भ (होते ही) [पज्जववत्तव्वमग्गो] पर्याय (आर्थिक नय के) वक्तव्य का मार्ग (बन जाता) है।
Meaning : Dravyastika Naya has for its province all those objects which are stripped of every kind of difference -- but as soon as those objects are subjected to some sort of difference or division they become the province of Paryayastika Nay.

  विशेष