
अत्थंतरभूएहि य णियएहि य दोहि समयमाईहिं ।
वयणविसेसाईयं दव्वमवत्तव्वयं पडइ ॥36॥
अह देसो सब्भावे देसोऽसब्भावपज्जवे णियओ ।
तं दवियमत्थि णत्थि य आएसविसेसियं जम्हा ॥37॥
सब्भावे आइट्ठो देसो देसो य उभयहा जस्स ।
तं अत्थि अवत्तव्वं च होइ दविअं वियप्पवसा ॥38॥
आइट्ठोऽसब्भावे देसो देसो य उभयहा जस्स ।
तं णत्थि अवत्तव्वं च होइ दवियं वियप्पवसा ॥39॥
सब्भावाऽसब्भावे देसो देसो य उभयहा जस्स ।
तं अत्थि णत्थि अवत्तव्वयं च दवियं वियप्पवसा ॥40॥
अर्थान्तरभूतेन च निजकेन च द्वाभ्यां समकमादिभिः ।
वचनविशेषातीतं द्रव्यमवक्तव्यं पतति (प्राप्नोति) ॥36॥
अथ देशः सद्भावे देशोऽसद्भावपर्यवे नियतः ।
तद्-द्रव्यमस्ति नास्ति च आदेशविशेषितं यस्मात् ॥37॥
सद्भावे आदिष्टो देशो देशश्चोभयथा यस्य ।
तदस्त्यवक्तव्यं च भवति द्रव्यं विकल्पवशात् ॥38॥
आदिष्टोऽसद्भावे देशो देशश्चोभयथा यस्य ।
तन्नास्त्यवक्तव्यं च भवति द्रव्यं विकल्पवशात् ॥39॥
सद्भावाऽसद्भावे देशो देशश्चोभयथा यस्य ।
तदस्ति नास्त्यवक्तव्यं च द्रव्यं विकल्पवशात् ॥40॥
अन्वयार्थ : [अत्थंतरभूएहि] अर्थान्तरभूत के द्वारा [य] और [णियएहि] निज के द्वारा [दोहि] दोनों के द्वारा [समयमाईहिं] एक साथ से [वयणविसेसाईयं] वचन विशेष से अतीत [द्रव्वं] द्रव्य [अवत्तव्वं] अवक्तव्य [पडइ] पड़ती है ।
[अह] और [देसो] भाग [सब्भावे] सद्भाव में देसो] एक देश [असब्भावपज्जवे] असतूभाव पर्याय में [णियओ] नियत [तं] वह [दवियं] द्रव्य [अत्थि] अस्ति [णत्यि] नास्ति [जम्हा] क्योंकि [आएसविसेसियं] भेद विशेषता है ।
[जस्स] जिसका [देसो] देश [सब्भावे] सद्भाव से [य] और [देसो] देश [उभयहा] उभय से [आइट्ठो] विवक्षित [तं] वह [दवियं] द्रव्य [वियप्पवसा] विकल्प वश [अत्थि अवत्तव्वं] अस्ति] अवक्तव्य है ।
[जस्स] जिसका [देसो] देश [असब्भावे] असत् भाव में [आइट्ठो] कहा जाता य] और [देसो] देश [उभयहा] उभयरूप से [तं] वह [दवियं] द्रव्य [वियप्पवसा] विकल्पवश [णत्थि अवत्तव्वं] नास्ति] अवक्तव्य [होइ] होता है ।
[जस्स] जिसका [देसो] देश [सब्भावासब्भावे] सद्भाव-असद्भाव में [य] और [देसो] देश [उभयहा] दोनों रूप से [तं] वह [दवियं] द्रव्य [वियप्पवसा] विकल्पवश से [अत्यि णत्यि च अवत्तव्वं] अस्ति] नास्ति और अवक्तव्य है ।
Meaning : If we desire to describe a thing simultaneously from the standpoint of its own particularising elements and the particularising elements of another thing, it baffles description and is said to be indescribable.
If we desire to say that a thing partly exists from one point of view and does not exist from another point of view -- that thing is said to exist and not to exist. If we desire to say that one part of a thing exists and another exists and does not exist at the same time the thing is said to be existing and indescribable.
If we desire to say that one part of a certain thing does not exist and another part does and does not exist at the same time, the thing is said to be not existing and indescribable.
If one part of a thing does and does not exist and another does and does not exist at the same time -- the thing is said to be existing, not existing and indescribable."
विशेष