+ अर्थपर्याय तथा व्यंजनपर्याय में भंग -
एवं सत्तवियप्पो वयणपहो होइ अत्थपज्जाए ।
वंजणपज्जाए उण सवियप्पो णिव्वियप्पो य ॥41॥
एवं सप्तविकल्पो वचनपथो भवत्यर्थपर्याये ।
व्यंजनपर्याये पुनः सविकल्पो निर्विकल्पश्च ॥41॥
अन्वयार्थ : [एवं] इस प्रकार [अत्थपज्जाए] अर्थपर्याय में [सत्तवियप्पो] सात विकल्प (रूप) [वयणपहो] वचनमार्ग [होइ] होता है [पुण] फिर [वंजणपज्जाए] व्यंजनपर्याय में [सवियप्पो] सविकल्प [य] और [णिव्वियप्पो] निर्विकल्प (रूप वचन मार्ग) होता है ।
Meaning : All these seven modes of stating a thing are possible in Artha Paryaya, but in Vyanjana Paryaya those statements that deal with the divisibe (Savikalpa) aspects of a thing as well as its indivisible aspects are possible.

  विशेष