+ बाह्याभ्यन्तर व्यवस्था की विशिष्टता -
ण य बाहिरओ भावो अब्भंतरओ य अस्थि समयम्मि ।
णोइंदियं पुण पड्डञ्च होइ अब्भंतरविसेसो ॥50॥
न च बाह्यो भावोऽभ्यंतरश्चास्ति समये ।
नोइन्द्रियं पुनः प्रतीत्य भवत्यभ्यन्तरविशेषः ॥50॥
अन्वयार्थ : [समयम्मि] शास्त्र में [बाहिरओ] बाहरी [अब्भिंतरओ] भीतरी [य] और [भावो] भाव [न] नहीं [य] और है [णोइंदियं] नोइन्द्रिय (मन) [पुण] फिर [पड़च्च] आश्रय करके [अब्भिंतरविसेसो] आभ्यन्तर विशेष [होइ] होता है ।
Meaning : In reality, there is no such division as external or internal; but internality depends upon mind.

  विशेष