+ दोनों नयों की मान्यता -
दव्वट्ठियस्स आया बंधइ कम्मं फलं च वेएइ ।
बीयस्स भावमेत्तं ण कुणइ ण य कोइ वेएइ ॥51॥
दव्वट्ठियस्स जो चेव कुणइ सो चेव वेयए णियमा ।
अण्णो करेइ अण्णो परिभुंजइ पज्जवणयस्स ॥52॥
द्रव्यार्थिकस्यात्मा बध्नाति कर्मं फलं च वेदयते ।
द्वितीयस्य भावमात्रं न करोति न च कश्चिद्‌ वेदयते ॥५१॥
द्रव्यार्थिकस्य यो चैव करोति स चैव वेदयते नियमेन ।
अन्य: करोति अन्य: परिभुक्ते पर्यवनयस्य ॥५२॥
अन्वयार्थ : [आया] आत्मा [कम्मं] कर्म को [बंधइ] बाँधता (है) [फलं] फल को [च] और [बेइए] भोगता (है) (यह मत) [दव्वट्ठियस्स] द्रव्यार्थिक (नय) का (है) [वीयस्स] दूसरे का (पर्यायार्थिक नय) [भावमेत्तं] भाव मात्र (है वह) [ण] नहीं [कुणइ] करता (बन्ध) है [ण] नहीं [य] और [कोइ] कोई [वेइए] (फल) भोगता है ।
जो [चेव] ही [कुणइ] करता है [सो] वह [चेव] ही [णियमा] नियम से [वेयइ] भोगता है (यह मत) [दव्वट्ठियस्स] द्रव्यार्थिक (नय) का है [अण्णो] अन्य [करेइ] करता (है और) [अण्णो] अन्य [परिभुंजइ] भोगता है (यह मत) [पज्जवणयस्स] पर्यायार्थिक (नय) का है ।
Meaning : According to the standpoint of Dravyastikanaya the soul does exist and therefore it is bound by Karma and gets the fruit of this bondage of Karma. According to Paryayastika on the other hand, there is nothing except creation. Neither, therefore, is anything bound or gets fruit of the bondage.
According to the view of Dravyastika whosoever does any thing, necessarily gets the fruit of it himself. According to the view of Paryayastika, however, some one does an act and another receives the fruit of that act.

  विशेष