+ वक्ता किसी एक नय से कथन करे -
पुरिसज्जायं तु पडुच जाणओ पण्णवेज्ज अण्णयरं ।
परिकम्मणाणिमित्तं दाएही सो विसेसं पि ॥54॥
पुरुषजातं तु प्रतीत्य ज्ञापक: प्रज्ञापयेदन्‍यतरत्‌ ।
परिकर्मणानिमित्तं दर्शयिष्यति सो विशेषमपि ॥५४॥
अन्वयार्थ : [जाणओ] जानकार (सिद्धान्तज्ञाता) [पुरिसज्जायं] पुरुष समूह को [तु] तो [पडुच्च] अपेक्षा करके [अण्णयरं] दोनों में से किसी एक (नय का ) [पण्णवेज्ज] प्रतिपादन करना चाहिए [परिकम्मणा] गुणविशेष के आधार के [णिमित्तं] निमित्त (से) [सो] वह [विसेसं] विशेष को [पि] भी [दाएही] दिखलायेगा ।
Meaning :  A wise speaker sometimes places before his audience even one of the two Nayas having regard to their various mental levels. - For that speaker is justified in stating one particular standpoint of one Naya only, with a view to lead them in the long run to all-comprehensive truth.

  विशेष