
जइ सव्वं सायारं जाणइ एक्कसमएण सव्वण्णू ।
जुज्जइ सयावि एवं अहवा सव्वं ण याणाइ ॥10॥
परिसुद्धं सायारं अवियत्तं दंसणं अणायारं ।
ण य खीणावरणिज्जे जुज्जइ सुवियत्तमवियत्तं ॥11॥
अद्दिट्ठं अण्णायं च केवली एव भासइ सया वि ।
एगसमयम्मि हंदी वयणवियप्पो न संभवइ ॥12॥
अण्णायं पासंतो अद्दिट्ठं च अरहा वियाणंतो ।
किं जाणइ किं पासइ कह सव्वण्णु त्ति वा होइ ॥13॥
केवलणाणमणंतं जहेव तह दंसणं पि पण्णत्तं ।
सागारग्गहणा हि य णियमपरित्तं अणागारं ॥14॥
अन्वयार्थ : [जह] यदि [सब्वण्णू] सर्वज्ञ [एक्कसमएण] एक साथ एक समय में [सव्वं] सब [सायारं] साकार आकार सहित पदार्थों को [जाणइ] जानता है तो [सया वि एवं] सदा ही इस प्रकार [जुज्जइ] युक्ति हो सकती है [अहवा] अन्यथा [सव्वं] सब को [ण] नहीं [याणाइ] जानता है ।
[सायारं] साकार ज्ञान [परिसुद्धं] निर्मल होता है [अणायारं] अनाकार [दंसण्णं] दर्शन [अवियत्तं] अव्यक्त रहता है [खीणावरणिज्जे] क्षीण आवरण वाले केवली में [सुवियत्तमवियत्तं] सुव्यक्त तथा अव्यक्त का भेद [ण] नहीं [य] और यह [जुज्जइ] युक्त है ।
[केवली] केवली भगवान् [एव] ही [सया वि] सदा ही [अहिट्ठं] अदृष्ट [च] और [अण्णायं] अज्ञात [भासइ] बोलते हैं [हंदी] निश्चय से [एगसमयम्मि] एक समय में [वयणवियप्पो] वचन-विकल्प [ण] नहीं [संभवइ] सम्भव है ।
[अण्णायं] अज्ञात को [पासंतो] देखने वाला [य] और [अद्दिट्ठं] अदृष्ट को [वियाणंतो] जानता हुआ [अरहा] अर्हन् केवली [किं] क्या [जाणइ] जानता है और [किं] क्या [पासइ] देखता है [त्ति] यह [कह] किस प्रकार [सव्वण्णु] सर्वज्ञ [वा होइ] होता है ?
[जहेव] जिस प्रकार [केवलणाणमणंतं] केवलज्ञान अनन्त है [तह] वैसे ही [दंसणं] दर्शन [वि] भी [पण्णत्तं] कहा गया है [किन्तु सागारग्गहणाहि] साकार ग्रहण की अपेक्षा से [य] और [अणागारं] अनाकार [णियम] नियम से [परित्त] अल्प है।आगम में केवली भगवान का दर्शन और ज्ञान अनन्त कहा गया है । परन्तु उनके दर्शन, ज्ञान के उपयोग में क्रम भाना जाय तो साकार-ग्रहण की अपेक्षा से परिमित विषय वाला होगा, जिससे उनके दर्शन में अनन्ता नहीं बन सकती । अतएवं केवली भगवान् में एक समय में ही उपयोग मानना चाहिए ।
Meaning : If you say that the omniscient comprehends in deeper details all physical things at one and the same time, you must admit that it is so at all times, otherwise there is no meaning in his omniscience.
Granted that the knowledge is distinct and that the perception is indistinct but in the case of a person whose knowledgeobstructions are absolutely removed there is no such thing as distinct or indistinct.
The omniscient, at all times, speaks of things unperceived and unknown-you will have to grant this and if you do so, you will not be able to account for the belief that the omniscient preaches a thing which is both known and perceived at one and the same time.
What can an omniscient know and perceive if he is said to be perceiving what is unknown and knowing what is unperceived ? If such is the case, how can he claim omniscience !
In the scriptures, both knowledge and perception are said to be endless. But if we make a distinction between perception and knowledge, the former has necessarily a limited province.
विशेष
विशेष :
यदि सर्वज्ञ एक समय में सभी पदार्थों को सामान्य-विशेष रूप आकार सहित जानता है, तो यह मान्यता युक्तियुक्त हो सकती है। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार से, मानने पर उनमें सर्वज्ञता, सर्वदर्शिता नहीं बन सकेगी । क्योंकि दोनों प्रकार के उपयोग (दर्शनोपयोग, ज्ञानोपयोग) अपने-अपने विषय को भिन्न-भिन्न रूप से जानते हैं । जिस समय एक उपयोग सामान्य का ज्ञाता होता है, उस समय विशेष का ज्ञान कैसे हो सकता है ? इसी प्रकार जब दूसरा उपयोग विशेष का ज्ञाता होता है, तो उसका कार्य भिन्न होता है । इसलिए वस्तु में पाए जाने वाले उभय धर्मों (सामान्य, विशेष) का ज्ञाता एक उपयोग नहीं हो सकता। अतएव इन उपयोगों में से क्रमशः जानने वाला सर्वज्ञ नहीं हो सकता । क्योंकि उनमें एक चैतन्य प्रकाश पाया जाता है ।
यह कथन करना कि केवली जिस समय साकार ग्रहण करते हैं, उस समय केवलदर्शन (अनाकार) अव्यक्त रहता है और जब वे दर्शन ग्रहण करते हैं, तब साकार अव्यक्त होता है, उचित नही है; क्योंकि उपयोग की यह व्यक्त एवं अव्यक्त दशा आवरण का सर्वथा विलय कर देने वाले केवली में नहीं बनती है ।
केवली सदा ही अदृष्ट, अज्ञात पदार्थों का कथन करते हैं -- ऐसा कहने से वे दृष्ट एवं ज्ञात पदार्थों के एक समय में उपदेशक होते हैं, यह वचन नहीं बन सकता है ।
यदि केवली अर्हन्त अज्ञात पदार्थ के दृष्टा और अदृष्ट पदार्थ के ज्ञाता हैं, तो इस स्थिति में उनमें एक समय में सर्वदर्शित्व तथा सर्वर्ज्ञत्व की सिद्धि नहीं हो सकती । क्योंकि उनमें विद्यमान दर्शन, ज्ञान, अपने-अपने विषय को देखने, जानने वाला है । जिस समय वह देखेगा, उस समय जानेगा नहीं और जिस समय जानेगा, उस समय देखेगा नहीं । इस प्रकार एक समय में एक साथ सामान्य-विशेष को जानने वाला उपयोग नहीं होगा । अत: उनमें सर्वदर्शित्व तथा सर्वज्ञत्व भी नहीं बन सकता ।
आगम में केवली भगवान का दर्शन और ज्ञान अनन्त कहा गया है । परन्तु उनके दर्शन, ज्ञान के उपयोग में क्रम भाना जाय तो साकार-ग्रहण की अपेक्षा से परिमित विषय वाला होगा, जिससे उनके दर्शन में अनन्ता नहीं बन सकती । अतएवं केवली भगवान् में एक समय में ही उपयोग मानना चाहिए ।
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