+ क्रमोपयोगवादी का कथन -
भण्णइ जह चउणाणी जुज्जइ णियमा तहेव एयं पि ।
भण्णइ ण पंचणाणी जहेव अरहा तहेयं पि ॥15॥
अन्वयार्थ : [भण्णइ] कहता है [जह] जिस प्रकार [चउणाणी] चार ज्ञान वाला [जुज्जइ] संयुक्त होता है [तहेव] उसी प्रकार ही [णियमा] नियम से [एयं पि] यह भी है [सिद्धान्ती भण्णइ] कहता है [जहेव] जिस प्रकार से ही [अरहा] केवली (सर्वज्ञ) [पंचणाणी] पाँच ज्ञान वाले [ण] नहीं [तहा] उस प्रकार [एयं पि] यह भी है ।
Meaning : Kramavadi says - As it is in the case of a person who is said to possess four kinds of knowledge so also it is the case here. To this the Author says :-As the omniscient can not be said to be the possessor of five fold knowledge so also it is the case here.

  विशेष 

विशेष :

क्रमवादी कहता है कि जिस प्रकार चार ज्ञान वाला अल्पज्ञानी (छद्मस्थ) निरन्तर ज्ञान-शक्ति-सम्पन्न ज्ञाता-द्रष्टा कहा जाता है, उसी प्रकार उपयोग का क्रम होने से केवली भी ज्ञाता-दृष्टा सर्वज्ञ कहलाता है । अतः क्रमवाद में कोई दोष नहीं है। इसका निराकरण करता हुआ सिद्धान्ती कहता है कि केवली भगवान्‌ का शक्ति की अपेक्षा विचार करना उचित नहीं है । क्योंकि उनकी शक्तियाँ व्यक्त हो चुकी हैं । अतएव केवली सर्वज्ञ को पाँच ज्ञान वाला भी नहीं कहा जाता है। केवली भगवान में सब प्रकार की ज्ञान-शक्तियों की पूर्णता होने पर भी शक्ति की अपेक्षा से नहीं, अपितु उपयोग की अपेक्षा से कथन किया गया है। क्‍योंकि आगम में कहीं भी उनके लिए 'पंचज्ञानी' शब्द का व्यवहार नहीं किया गया है ।