
पण्णवणिज्जा भावा समत्तसुयणाणदंसणा विसओ ।
ओहिमणपज्जवाण उ अण्णोण्णविलक्खणा विसओ ॥१६॥
तम्हा चउव्विभागो जुज्जइ ण उ णाणदंसणजिणाणं ।
सयलमणावरणमणंतमक्खयं केवलं जम्हा ॥१७॥
अन्वयार्थ : [समत्त] समस्त [सुयणाणदंसणा] श्रुतज्ञान रूप दर्शन का [विसओ] विषय [पण्णवणिज्जा] प्रज्ञापनीय [भावा] पदार्थ पदार्थ हैं [उ] किन्तु [ओहि मणपज्जवाण] अवधि ज्ञान और मनःपर्ययज्ञान के [अण्णोण्ण] परस्पर [विलक्खण] विलक्षण वाले पदार्थ [विसओ] विषय हैं ।
[तम्हा] इसलिये [चउव्विभागो] चार विभाग मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्ययज्ञान का विभाग [जुज्जइ] युक्त है [ण उ] किन्तु नहीं बनता है [जिणाणं] जिन के [णाणदसंण] ज्ञान-दर्शन में [जम्हा] क्योंकि [केवल] केवल ज्ञान [सयलं] सम्पूर्ण [अणावरणं] अनावरण [अणंतं] अनन्त और [अक्खयं] अक्षय है ।
Meaning : That kind of knowledge, which is called Sruta i.e, heard or studied, deals with things that can be stated or mentioned by means of words. While the provinces of Avadhi and Manahparyaya kinds of knowledge are things altogether distinct and different in each kind. All these things are limited and may yield to some sort of classification or division.
But in the case of knowledge, and perception of a Kevalin unlike the four kinds of knowledge no division is possible. For that knowledge and perception are absolute, perfect, endless and imperishable.
विशेष
विशेष :
सम्पूर्ण श्रुतज्ञान रूपी दर्शन का विषय शब्दों से प्रतिपादन करने योग्य द्रव्यादिक पदार्थ हैं । किन्तु अवधिज्ञान और मन:पर्ययज्ञान में यह विशेषता है कि वह परस्पर विलक्षण पदार्थों को भी विषय करता है। श्रुतज्ञान कुछ पर्याय सहित सब द्रव्यों को जानता है। उसका विषय है - शब्दों के माध्यम से पदार्थ को प्राप्त करना । अवधिज्ञान का विषय भी सीमित है । अवधिज्ञान इन्द्रियादिक की सहायता के बिना ही रूपी पुद्गल द्रव्य को विशद रूप से जानता है, किन्तु अरूपी को वह भी नहीं जानता । मनःपर्ययज्ञान दूसरे के मनस्थित मन को ही जानता है, अमूर्त द्वव्यों को जानना उसका भी विषय नहीं है । अतएव चारों ज्ञान सभी पर्यायों सहित द्रव्य को नहीं जानते । परन्तु श्रुतज्ञान से अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान के विषय में उत्तरोत्तर विशिष्टता लक्षित होती है ।
ज्ञान में मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान, ये चार विभाग बन जाते हैं, किन्तु ज्ञान, दर्शन की प्रधानता वाले केवली भगवान् में ज्ञान, दर्शन का विभाग नहीं बनता; क्योंकि केवलज्ञान सम्पूर्ण विषय को जानने वाला, आवरण से रहित, अनन्त और अक्षय होता है ।
|