
परवत्तव्वयपक्खा अविसिट्ठा तेसु तेसु सुत्तेसु ।
अत्थगईअ उ तेसिं वियंजणं जाणओ कुणइ ॥18॥
अन्वयार्थ : [तेसुतेसु] उनमें-उनमें [सुत्तेसु] सूत्रों में [परवत्तव्वयपक्खा ] पर वक्तव्य के समान [अविसिट्ठा] अविशिष्ट सामान्य हैं [उ जाणओ] इसलिए जानने वाला [अत्यगईय] अर्थ की गति के अनुसार [तेसिं] उन का [वियंजणं] प्रकटन [कुणइ] करता है ।
Meaning : In some of the Sutras apparently it seems that the views of Krama-vada and Sahavada are mentioned and supported but it is for the wise to see that these Sutras are interpreted in their proper spirit .
विशेष
विशेष :
जिस प्रकार से अन्य दर्शनों में कथन है, वैसे ही सामान्य रूप से सूत्रों में यदि अर्थ प्रतिभासित हो, तो विरोधी प्रतीत होता है। वास्तव में सूत्रों में परस्पर विरुद्ध कथन नहीं है । अतः ज्ञाता पुरुष अर्थ की सामर्थ्य के अनुसार उन सूत्रों की व्याख्या करे ।
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