
जेण मणोविसयगयाण दंसणं णत्थि दव्वजायाण ।
तो मणपज्जवणाणं णियमा णाणं तु णिद्दिट्ठं ॥19॥
अन्वयार्थ : [जेण] जिस कारण से [मणोविसयगयाणं] मन के विषयगत [दव्वजायाणं] द्रव्य-समूह का [दंसणं] दर्शन [णत्थि] नहीं होता है [तो] इसलिए [मणपज्जवणाणं] मनःपर्ययज्ञान को [णियमा] नियम से [णाणं] ज्ञान [णिहिट्ठं] निर्दिष्ट किया गया है ।
Meaning : In as much as there is no Perception of substance that is the object of Manah-paryaya, it is exclusively said to be Gyana and not perception.
विशेष
विशेष :
मन:पर्ययज्ञान में विषयभूत पदार्थों का सामान्य रूप से ग्रहण नहीं होता, किन्तु विशेष रूप से ग्रहण होता है । अतएवं मनःपर्ययदर्शन नहीं होता । सामान्य रूप से ज्ञान के पहले दर्शन होता है, किन्तु मन:पर्यय-ज्ञान में ऐसा नियम नहीं हैं। मन:पर्ययज्ञान बिना दर्शन के ही होता है । मन:पर्ययज्ञान में विशेष का ही ग्रहण होता है; सामान्य का नहीं । अत: मन:पर्ययज्ञान ही है; दर्शन नहीं है ।
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